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Thursday, January 30, 2020

भील प्रदेश युवा मोर्चा, भील प्रदेश विद्यार्थी मोर्चा, भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा द्वारा महामहिम राष्ट्रपति के नाम एसडीएम को सोपा ज्ञापन...

पेटलावद से राज मेड़ा की रिपोर्ट

 पेटलावद। अनुसूचित क्षेत्रों जनजाति क्षेत्रों में ईवीएम बेन एवं सीएए एनपीआर एनआरसी के लिए आदिवासियों से दस्तावेज की अनिवार्यता खत्म हो तथा अन्य लोगों की एनडीए बेस एनआरसी लागू कराने सहित बहुजन क्रांति मोर्चा को मुद्दे आधार थी समर्थन देने को लेकर ,भील प्रदेश युवा मोर्चा, भील प्रदेश विद्यार्थी मोर्चा, भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा  ने  एसडीएम  एमएल मालवीय को  ज्ञापन सौंपा गया
ज्ञापन में आदिवासी समुदाय का कहना है कि आदिवासी समुदाय (अनुसूचित जनजाति) सदियों से नैसर्गिक गणतंत्र लोकतंत्र की समाज व्यवस्था की जीवन पद्धति जीते हुए आए हैं जिसमें ऊंच-नीच छुआछूत अस्पृश्यता भेदभाव गैर बराबरी श्रेणीबध्ता का अभाव रहा है मानवीय विकारों से दूर नैसर्गिक जीवनशैली आज भी व्यवहार में जीवित मौजूद है जिस तरह दुनिया में अमेजॉन के वन पूरे जीव जगत के लिए फेफड़ों के समान है उसी तरह पूरे मानव समुदाय के लिए विश्व के आदिवासी समुदाय वैश्विक विरासत के समान है यही बात भारत के आदिवासियों की सांस्कृतिक विरासत पर लागू होती हैं अनुसूचित क्षेत्रों जनजाति क्षेत्रों में ईवीएम बेन होना चाहिए एवं बैलेट पेपर से चुनाव होना चाहिए तथा अनुसूचित क्षेत्र जनजाति क्षेत्र आदिवासी समुदाय से दस्तावेजी मांगना अनिवार्य न हो डीएनए बेस एनआरसी लागू होनी चाहिए
सी ए ए एनपीआर एनआरसी के लिए वोटर लिस्ट वोटर पहचान कार्ड राशन कार्ड पैन कार्ड जॉब कार्ड आधार कार्ड को भारत की नागरिकता के लिए वैद्य दस्तावेज नहीं माना है जबकि वोटर लिस्ट से 1951 से ही लोकतांत्रिक तरीके से राज्य सरकार केंद्र सरकार का चुनाव करते हुए आए हैं जन्म प्रणाम पत्र की मांग की जा रही है जबकि पिछले 10 वर्षों से पूर्व लगभग 90% आदिवासी महिलाओं का प्रसव पारंपरिक तरीके से घर पर ही होता था और जन्म प्रणाम पत्र लेने जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी जरूरी भी नहीं था कई लोगों को अपनी वास्तविक जन्म तारीख की पता नहीं है क्योंकि वे होली दिवाली बारिश सर्दी गर्मी ऋतु पूनम ग्यारस आषाढ़ सावन इस तरह मुखी की याद रखने की वर्षों पुरानी परंपरा आज भी जिंदा है ऐसी विषम परिस्थिति में जी रहे आदिवासी समुदाय से 1971 से पहले के जन्म प्रणाम पत्र जमीन के दस्तावेज मांगना एवं वोटर लिस्ट को वैध दस्तावेज की श्रेणी में नहीं रखन  इसको लेकर आदिवासियों में काफी आक्रोश है

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