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Friday, January 3, 2020

बैंक व कियोस्क सेंटरों की मिलीभगत, ग्रामीण जनता परेशान ऐजेंसी गांव की, चल रहीं मुख्यालय पर.....

पेटलावद से ओपी मालवीय की रिपोर्ट

पेटलावद। देश के मुखिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा पहली बार प्रधानमंत्री बनते हीं सबसे अधिक जोर अधिक से अधिक लोगो को बेंकिंग सेक्टर से जोड़कर सारे वितिय लेन देन बैंक के माध्यम से करायें जाने का संकल्प देश को देते हुए ग्रामीण क्षेत्र के छोटे से छोटे व्यापारी व किसान वर्ग के व्यक्ति को बैंक में खाता खोलने के लिए प्रेरित किया और लोगो की सुविधाओं को देखते हुए जिन ग्रामीण इलाको में बैंको की शाखाएं नहीं खोली जा सकती वहां कियोस्क के माध्यम से लोगो को जोड़ने की कवायद की गई। कियोस्क सेंटर जो कि एक तरह से बैंक की मुख्य शाखा की चलित व संस्था होती है जो कम संसाधनों के साथ ठेठ ग्रामीण ईलाकों में रहने वाले लोगो के समय की बचत हेतू उनके हीं क्षेत्र में जाकर लेन देन करने के लिए ग्रामीणों की सुविधा के लिए खोली गई है लेकिन पेटलावद क्षेत्र में तहसील स्तर की बैंक शाखाओं के प्रबंधकों और कियोस्क सेंटरों के संचालकों की मिलीभगत के चलते ग्र्रामीणों को परेशानिया देखनी पड़ रही है।

दम तोड़ती योजना....

उल्लेखनिय है कि पेटलावद में सभी राष्ट्रीकृत बैंको अर्थात भारतीय स्टेट बैंक, बैंक आॅफ बडोदा, स्टेट बैंक आॅफ इंडिया सहित कई बैंको की मुख्य शाखाएं तहसील स्तर पर स्थित है और इन बैंको के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में कियोस्क सेंटर खोलकर एंजेंसिया दे रखी है लेकिन बैंको के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों के नाम पर स्थापीत कियें गयें कियोस्क सेंटर मुख्यालय पर हीं संचालित हो रहे है जिससे ग्रामीणों को अपने वितिय काम काज के लिए मुख्यालय पर हीं आना पड़ रहा है। सुत्रों की माने तो अधिकांश बैंको ने रायपूरिया, सारंगी, बामनिया, बाछीखेड़ा, सेमलिया, खोरिया आदि गांवो में कियोस्क सेंटर खोले जाने के लिए ऐजेंसी दी गई है लेकिन यह सभी कियोस्क सेंटर कागजों में इन गांवो में चल रहे है लेकिन वास्तविकता में यह सभी कियोस्क सेंटर पेटलावद मुख्यालय पर हीं संचालित हो रहे है जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में कियोस्क सेंटर खोलने का और ग्रामीणों को राहत देने की योजना दम तोड़ती नजर आ रहीं है।

समय व पैसा दोनो खर्च...

उल्लेखनिय है कि इन कियोस्क सेंटरों तक लेन देन करने के लिए ग्रामीणों को उतना हीं समय व किराया आदि खर्च करना पड़ता है जितना की मुख्य शाखा में जाने के लिए करना होता है, ग्रामीणांे की माने तो सरकार ने सुविधा के नाम पर कागजी खाना पूर्ति कर रखी है लेकिन इसका फायदा ग्रामीणों को नहीं मिल रहा है। साथ हीं इन कियोस्क संेटर संचालको की मनमानी के चलते जितनी लम्बी कतार बैंक शाखा में देखने को मिलती है उतनी हीं लम्बी कतार कियोस्क सेंटरों पर भी देखने को मिल जाती है। यदि कियोस्क सेंटर संबंधित गांव में हीं संचालित होते तो कम से कम उस क्षेत्र के ग्रामीणों को मुख्यालय पर आने की जरूरत नहीं पडती और उनका काम गांव में हीं हो जाती।

मेनेज मेनेजरों की दया..... 

ऐसा नहीं है कि ग्रामीण क्षेत्र के नाम पर जारी की गई कियोस्क की ऐजेंसी ग्रामीण क्षेत्र के स्थान पर नगर में चल रहीं है और बैंक प्रबंधकों के इसकी जानकारी नहीं है। माना यह जा रहा है कि अधिकांश कियोस्क संचालको से बैंक प्रंबधकों से सीधी संाठ गांठ होने के चलते बैंक प्रबंधकों द्वारा संचालकों को मनमानी करने के लिए खुला छोड दिया गया है, कुछ ग्रामीणों ने तो बैंक से दियें जाने वाले ऋण की सेंटींग कियोस्क संचालकों के द्वारा बैंक से करवायें जाने के आरोप भी लगायें जा रहे है। बैंक मेनेजरों की दया के चलते इन कियोस्क सेंटरों की बल्ले-बल्ले हो रहीं है।

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