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Friday, February 7, 2020

पेटलावद आदिवासियों में भी सामाजिक बदलाव, शादियों के उदाहरण से समझें कितना कुछ बदल गया।

पेटलावाद से हरिश राठौड़ की रिपोर्ट

पेटलावाद। आदिवासी समाज में विवाह समाराेह काे एक पर्व की तरह मनाया जाता है। शादियों में लोग पूरे उत्साह और उल्लास के साथ शामिल होते हैं। नाचते-गाते हैं, खाते-पीते अपनी परंपरा निभाते हैं। समाज की शादियों में अब आधुनिकता का समावेश काफी हद तक दिखाई देता है। यहां हम दो दशक पहले ओर आज की शादियों में आए अंतर को बता रहे हैं, की आदिवासी समाज मे क्या क्या बदला है। शादियों में पहनावा बदला है, बारातों के तौर तरीके बदल गए हैं। समाज की परंपराएं कुछ पूरी तरह से निभाई जाती है तो कुछ औपचारिकता की पूर्ति की जाती है। लेकिन जज्बा, उत्साह और उल्लास वही सदियों पुराना है।

तीन दशक पहले इस प्रकार होती थी शादियां।

बरवेट निवासी नंदू भाई भूरिया बताते है कि आज से तीस साल पहले पुरुष-महिलाएं परंपरागत पोशाक में नंगे पैर हाथों में तलवार और फालिये लेकर नृत्य करते चल रहे होते थे। शादियों में ढोल-मांदल पर नाचते-थिरकते थे। एक व्यक्ति द्वारा दूल्हे को कंधों पर उठा लेते थे, फिर मांदल की थाप पर नाचते हुए चलते रहते थे। संभवत: वो दूल्हे का मामा या जीजा होता है। पुरुष-महिलाएं परंपरागत पोशाक रहते थे। किसी के पैर में जूते या चप्पल नहीं होते थे। पथरीली जमीन पर हाथों में तलवार और फालिये लेकर नृत्य चल रहा होता था। मांदल के साथ नाचते ये लोग कुर्राटियां भरते थे तो दूर तक आवाज जाती थी। दूल्हे को इसी तरह कंधों पर उठाकर नाचते थे। ऐसे ही नाचते हुए कई- कई किलोमीटर दूर बारातें चली जाया करती थी।

*आज की शादी में इतना अंतर-
आदिम जाति सेवा संस्था बरवेट के प्रबंधक अन्नू सिह गामड़ ने बताया कि आज की शादी समारोह में मांदल की जगह डीजे पर नाच रहे, बारातें अब पैदल नहीं बस, कार और जीप की कतारों में जाने लगीं, दूल्हे भी शेरवानी, कोट-पेंट पहन रहे है
। आगे आगे डीजे सिस्टम उसके पूछे सेकड़ो बाइक, उसके पीछे दर्जन भर कर व जीप से बारात जाती है। बारात जाती हो तो ऐसा लगता है जैसे कोई मुख्यमंत्री का काफिला जा रहा हो।

अब ये बदलाव :

ग्राम बरवेट के हकरिया तड़वी ने बताया कि आदिवासी समाज की शादी में काफी बदलाव आ गया है। चांदी के गहनों की जगह आर्टिफिशियल जेवर आ गए, लड़के जींस-टी-शर्ट में पहुंच रहे, सेल्फी के लिए स्टिक का कर रहे उपयोग।अब शादियों में युवा पश्चिमी वेशभूषा में दिखाई देता है। बारातें पैदल नहीं जाती, कारों, बसों और जीपों की कतारों में जाती हैं। कार में दूल्हे को बिठाने के पहले कुछ देर कंधों पर उठाकर परंपरा निभाने नाचते  है। दूल्हे शेरवानी, कोट-पेंट या कुर्तों में दिखने लगे है। महिलाएं जरूर पारंपरिक परिधानों को ही महत्व देती हैं। चांदी के गहनों की बजाय या तो सोने के आभूषण या सोने जैसे दिखने वाले आर्टिफिशियल जेवर आ गए। लड़के जींस-टीशर्ट में आते हैं। जूते नई फैशन के हिसाब से है। मांदल की जगह डीजे ने ले ली और गुजराती गीत बजते हैं। सबके पास मोबाइल है और सेल्फी लेने के लिए सेल्फी स्टिक भी। कई बार नाचते लोगों पर फोम का स्प्रे भी दिख जाता है। यानि वो सबकुछ होता है जो किसी शहरी शादी या बरात में देख सकते हैं।

शिक्षित होने पर ज्यादा आया बदलाव

ग्राम बरवेट स्कूल के शिक्षक मणिलाल भूरिया ने बताया कि आदिवासी समाज मे बदलाव का कारण शिक्षा है। सरकार द्वारा फलिए फलिए में स्कूल ओर आंगनवाड़ी केंद्र खोल दिये है। सरकार पड़ने लिखने के लिए हर प्रकार की सुविधा दे रही है। जिसको ग्रहण कर आज हर व्यक्ति अपना अच्छा और बुरा समझ सकता है। शिक्षित होकर समाज मे फैली कुरीतियों ओर बुराइयों से दूर हो रहा है।

समाज मे बदलाव का मुख्य कारण कृषि भी है।

ग्राम आमलीरुडा के युवा किसान वागमल खड़िया ने बताया कि हमारे समाज में बदलाव का मुख्य कारण कृषि भी है। आजसे दो दशक पहले यहां के लोग मजदूरी पर निर्भर थे, लेकिन अब माहीनहर आने से यहां के आदिवासी किसान पारंपरिक खेती के साथ साथ आधुनिक खेती भी करने लग गए है। जिससे शादी विवाह और अन्य सामाजिक कार्यक्रम में दिल खोलकर खर्च करने लगे है।

परस्पर व्यवहार एव एक दूसरे का सहयोग करना समाज की विशेषता।

ग्राम महूडीपाड़ा के शिक्षक मुन्नालाल गरवाल ने बताया कि परस्पर व्यवहार एव एक दूसरे का सहयोग करना समाज की विशेषता है। हमारे समाज मे जब बारात जाती है तो दुल्हे की बारात में जो गाड़िया जाती है वह परस्पर व्यवहार से आती है। यानी कि दुल्हे के दोस्त रिश्तेदार ओर परिवार के लोग गाड़िया ओर बाइक लेकर बारात में आते है। यह एक प्रकार का सहयोग होता है। कही कही दूल्हे के परिवार ही इसकी व्यवस्था करता है।

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