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Friday, March 6, 2020

मन कि एकाग्रता के अभ्यास से ध्यान धारा में प्रवाहित होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है - जिनेन्द्रमुनि



थांदला नगर में भक्तों के भगवान पधारें

थांदला। विभिन्न क्षेत्रों की स्पर्शना करते हुए मेघनगर कि ओर से उग्र विहार कर जैन धर्म दिवाकर धर्मदास सम्प्रदाय गण प्रमुख जिनशासन गौरव आचार्य भगवंत पूज्य श्रीउमेशमुनिजी महाराज साहब के शिष्य बुद्धपुत्र प्रवर्तक पूज्य श्रीजिनेंद्रमुनिजी महाराज साहब, मधुर व्याख्यानी थांदला के नंदन पूज्य श्रीसंदीपमुनिजी महाराज साहब, सेवाभावी पूज्य श्रीआदित्यमुनिजी महाराज साहब आदि ठाणा - 3 का मंगल प्रवेश थांदला नगर में हुआ। उनकी अगवानी के लिए सकल जैन समाज निर्धारित वेशभूषा में गुरुदेव के जयकारों के साथ नगर के दक्षिण छोर पर पहुँचा जहाँ विश्राम गृह पर श्रीसंघ ने सभी के लिए नवकारसी की व्यवस्था की थी। वहाँ से भव्य अगवानी के साथ गुरुभगवन्त स्थानीय आजाद चौक स्थित पौषध भवन पर पधारें। धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए प्रवर्तक देव ने कहा कि मन को चंचलता की उपमा दी गई है। इस चंचल मन को किसी बाहरी अचित पुदगल वस्तु पर केंद्रित कर एकाग्र किया जा सकता है। पूज्यश्री ने कहा कि व्यक्ति घर परिवार में भी मन की चंचलता का अनुभव करता है व उसे दूर करने के लिए घूमना-फिरना आदि मनोरंजन कार्य करता है लेकिन यह मिथ्या पुरूषार्थ है जबकि मनुष्य मोक्ष को लक्ष्य में रखकर निरन्तर अभ्यास से मन की एकाग्रता बढाते हुए ध्यान धारा में प्रवाहित होकर क्षपक श्रेणी अर्थात शुक्ल ध्यान में प्रविष्ट होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। उन्होंने महभारत काल के समय में अर्जुन का उदाहरण देकर बताया कि निरन्तर अभ्यास व लक्ष्य पर ध्यान केंद्रीत करने से वह श्रेष्ठ धनुर्धर बना वैसे ही पूज्य श्री नन्दलालजी महाराज साहब निरन्तर साधना को बढ़ाते हुए 150 लोगस्स का ध्यान कर अपनी साधना को गतिशील बनाया व जिस प्रकार अस्थिर पानी, पवन, अग्नि को वस्तु के माध्यम से स्थिर कर सकते है वैसे ही हम भी बाहरी अचित वस्तु पर एकाग्र मन सन्निवेश द्वारा ध्यान धारा में प्रविष्ट हो सकते है। धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए थांदला के नन्दन मधुर व्याख्यानी पूज्य श्रीसन्दीपमुनिजी ने फरमाया की अहंकार ज्ञान के लिए बाधा है व ज्ञान पचाने में भी बाधा उत्पन्न करता है। उन्होंने कहा कि व्यवहारिक शिक्षा में भी धैय की आवश्यकता होती है जैसे कुशल जौहरी बनने के लिए धैर्य के साथ पत्थर की परख व उसे तराशने की कला सीखनी पड़ती है तभी वह कुशल जौहरी बन सकता है वैसे ही आध्यात्मिक ज्ञान के लिये भी अहंकार व प्रदर्शन का कोई स्थान नही है। उन्होंने कहा कि आज के युग मे वैसे तो लब्धियाँ प्रायः समाप्त हो गई है लेकिन यदि किसी के पास है तो वह बताता नही है और जो बताता है वह केवल अहंकार का पोषण कर दिखावा मात्र करता है। श्रीसंघ अध्यक्ष जितेंद्र घोड़ावत ने बताया कि पूज्यश्री के अल्प प्रवास के लिए थांदला नगर में मंगल प्रवेश व यहाँ विराजित सरलमना विदुषी महासती पूज्या श्रीनिखिलशिलाजी, स्थविर महासती पूज्या श्रीप्रियशीलाजी, पूज्या श्रीदिव्यशीलाजी व पूज्या श्रीदिप्तीश्री के सानिध्य से चतुर्विध संघ में धर्ममय माहौल बन गया वही पूज्यश्री के सानिध्य में नित्य प्रातः राइसी प्रतिक्रमण, प्रार्थना, प्रवचन, धर्मचर्चा व देवसी प्रतिक्रमण चौवीसी होगी । इस अवसर पर अणु आराधना मण्डल ने अभिनन्दन अभिनन्दन आपका करते हम अभिनन्दन स्तवन गाया। संचालन संघ मंत्री प्रदीप गादिया ने किया धर्म प्रभावना का लाभ राकेश कुमार प्रफुल्ल कुमार तलेरा परिवार ने लिया बाहर से पधारें गुरु भक्त मेहमानों के आतिथ्य सत्कार का लाभ अनिल शांतिलालजी गादिया परिवार ने लिया। उक्त जानकारी संघ प्रवक्ता पवन नाहर ने दी।

होली चातुर्मास 12 को कल्याणपुरा में

पूज्य प्रवर्तक देव का होली चातुर्मास 12 मार्च गुरुवार को झाबुआ जिले के कल्याणपुरा में होगा। जहाँ पूज्य श्री विभिन्न श्रीसंघ की वर्षभर की गई विनन्ति को ध्यान में रखते हुए धर्मदास गण के सन्त - सतियों के द्रव्य क्षेत्र काल की मर्यादा रखते हुए सूखे समाधे आगामी वर्षावास की घोषणा करेंगे। आगामी वर्षावास की विनन्ति लेकर राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश के अनेक स्थानों से श्रीसंघ के पदाधिकारी श्रावक श्राविकाऐं पूज्यश्री की सेवा में आएंगे व उनके दर्शन वंदन मांगलिक का लाभ भी लेंगे।

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