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Sunday, March 29, 2020

कोरोना वायरस का कहर टुट रहा गरीबों पर..... आने वाले तीन माह में गरीबों की माली हालत बिखर जाएगी......कई होंगे अवसाद का शिकार.... भयावह तस्वीर दे रहीं सरकारों के विफलता की गवाहीं....




पेटलावद से हरिश राठौड़ की रिपोर्ट

पेटलावद। कोरोना संकट के चलते जहां पुरे देश में लाक डाउन की स्थिती बनी हुई है और इसका सबसे अधिक खामियाजा गरीब मजदुर वर्ग को उठाना पड़ रहा है। गुजरात की और से प्रतिदिन सेंकड़ों मजदुर भुखे प्यासें अपने गांवो की और लोट रहे है। सेंकडों किमी. की पदयात्रा बिना कुछ खायें पीयें उन्हें तय करना पड़ रहीं है, लेकिन प्रशासन की और से उन्हें कोई खास मदद नहीं दी जा रहीं है। इस कारण इन मजदुरों को अपने जीवन के बेहद बुरे दिन देखना पड रहे है। ताजुब इस बात का है कि पुरे प्रशासन और जनप्रतिनिधी अभी भी लाकडाउन को सफल बनाने के चक्कर में इनकी पिड़ा से बेखबर बने हुए है। आदिवासी महिला पुरूष तो अपने दुध मुंहे बच्चों के साथ पेदल यात्रा कर अपने घर पहुंचने की जुगाड़ में है उन्हें पेदल चलने के कारण एक तरफ थकान सता रही तो दुसरी तरफ भुख से उनकी हालत खराब हो रहीं है। झाबुआ जिले में यु भी रोजगार के अभाव में प्रतिवर्ष हजारों आदिवासी गुजरात के अहमदाबाद, मोरवी, बडोदा, भुज, रापी आदि के अलावा महाराष्ट्र के नासिक तथा दहीसर आदि क्षेत्रों में पलायन करते है। साथ हीं राजस्थान के कोटा, मोदक तथा उदयपुर में भी भवन निर्माण, पत्थर की खदान तथा कृषी कार्य के लिए मजदुरी हेतू जाते है। वर्तमान में चोतरफा लाकडाउन की वजह से उन्हें रोजगार और ठोर ठिकाने के अभाव में अपने घरों की और भागना पड़ रहा है, स्थिती यह है कि न तो इनके पास खाने पिने का कोई प्रंबंध है और ना हीं इनके हाथ में रूपयें पैसे है। कई जानकार यह सवाल उठा रहे है कि म.प्र. सरकार जब जिले में करोड़ो रूपयें के विकास कार्य शुरू करने के दावें करती है तो फिर आखिर इन मजदुरों को बाहर मजदुरी के लिए क्यों जाना पडता है, इससे स्पष्ट है कि या तो विकास कार्य कागजों पर चल रहे या फिर इन कार्यो में बडे स्तर पर कमिशनखोरी के चलते मशिनों को धडल्ले से उपयोग हो रहा है और इस बंदरबांट में नेता, अफसर, अधिकारी, ठेकेदार सब शामिल लगते है वरना संसद और विधानसभा में हजारों जिलेवासी मजदुरों की व्यथा नेताओं के मुंह से क्यों नहीं निकलती है।

सरकारों पर करारा तमाचा यह तस्वीर.....

आजादी के बाद से हीं म.प्र. में शासन करने वाली सरकारें चाहे व भाजपा की हो कांग्रेस की सभी के द्वारा झाबुआ एवं अलिराजपुर क्षेत्रों के आदिवासियों के उत्थान एवं रोजगार तथा शिक्षा को लेकर कई प्रकार की न कई प्रकार की योजनाए बनाई है बल्की इनके विकास एवं रोजगार के लिए हजारों लाखों रूपयें का फंड भी दिया गया है, यहा तक की इन दोनो हीं जिलों में जब भी कोई राजनितिक सम्मेलन या केन्द्र या राज्य स्तर का जनप्रतिनिधि आता है तो वह आदिवासियों के हितों की बात करने से नहीं चुकता है, यदि सरकारों द्वारा लाखों करोड़ों रूपयें की राशि इस क्षेत्र की जनता के लिए खर्च की जा रहीं है तो फिर एैसी स्थिती क्यों बन रहीं है कि यहां के वनवासी व्यक्ति को पूर्णकालिक रोजगार यहीं पर उपलब्ध नहीं हो रहा है, यदि इमानदारी से इस राशि को खर्च किया जाता तो इस आदिवासी अंचल के किसी भी व्यक्ति को अपने पेट के लिए मजदुरी के लिए पलायन करने की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन जो भयावक तस्वीर झाबुआ एवं अलिराजपुर के बार्डरों पर इन दिनों मजदुरों के पलायन की दिख रहीं है इससे यह सीधा स्पष्ठ होता है कि आदिवासी अंचल में विकास एवं शिक्षा तथा रोजगार के नाम पर दियें जाने  वाले हजारों लाखों रूपयें की राशि में सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार हुआ है, कोई भी अंश इस राशि का यदि इनके कल्याण के लिए उपयोग में लाया जाता तो आज पलायन की यह तस्वीर सामने नहीं आती। कोरोना की बीमारी के चलते हीं सहीं यह जो तस्वीर सामने आई यह आजादी से अब तक की सभी म.प्र. की सरकारों के लिए करारा तमाचा है, जो इसने वर्षो बाद भी इस आदिवासी क्षेत्र के लोगो को अपने हीं क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध कराने में नाकाम साबित रहीं है।

विभिन्न योजनाओं की खुली पोल....

क्षेत्र में ग्राम पंचायत की विभिन्न योजनाओं जैसे पंचपरमेश्वर योजना, बारवा वित्त आयोग तथा एैसी अनेक विकास योजनाओं के माध्यम से कई निर्माण कार्य गांव में करवायें जाने के दावें कियें जाते है, इसके अतिरिक्त सिंचाई विभाग, वन विभाग, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग आदि के माध्यम से भी अनैक निर्माण कार्य गांवों में करवायें जाने की खबरे आती है परन्तु इसके बाद भी आदिवासियों को अपना व अपने परिवार का पेट पालने के लिए अन्य राज्यों में पलायन करना पड़ता है और कोरोना वायरस के खतरे के इस वर्तमान समय में उन्हें सर्वाधिक तकलिफें उठाना पडती है।
कोरोना ने एक तरह से सरकार की विकास की सभी परियोजनाओं की पोल खोलकर रख दी है, प्रतिवर्ष सरकार अपने संचार माध्यमों से विज्ञापनबाजी करते हुए विकास का ढिढोरा पीटती है और प्रतिवर्ष मिडि़या आदिवासियों के पलायन की खबरे को समाचार पत्रों के माध्यम से प्रकाशित करता है परन्तु तब भी प्रशासन स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध करवाने में असफल साबित होता है। इस बार भी एैसा हीं हुआ कोरोना संकट के कारण जब हजारों आदिवासी मजदुर डर के और भुखमरी के कारण अपने घरों की तरफ आने लगे है तब यह सच्चाई सामने आ गई कि वास्तव में स्थानीय प्रशासन इन मजदुरों को रोजगार उपलब्ध नहीं करवाता बल्की विकास के मनमाफिक आंकडे जारी करता है।

किसान सबसे ज्यादा परेशान....

कोरोना संकट के कारण किसानों की स्थिती बेहद खराब है, खेतो में रबी की फसल जैसे गेंहू, चना ,अलसी आदि कटाई के लिए तैयार है  तथा कुछ जगहों पर कट भी गई है, कुछ जगह खलिहान रखी है। जिन किसानों ने अपनी फसल को तैयार कर लिया है उन किसान में उसे देखने की समस्या है। मण्डी बंद होने कारण स्थानीय बाजार में चोरी चुपके पुलिस से बचकर अपनी फसल ओने पोने दाम पर बेच कर अपने बच्चों का पेट भरने की मजबुरी से किसान हालाकान है। मुनाफाखोर व्यापारी भी कोरोना संकट को कमाई के एक अवसर के रूप में भुनाने से बाज नहीं आ रहा है, जहां उसने चाय, तेल, शक्कर, साबन, मिर्च, मसाला आदि खाद्य वस्तुओं के दाम बड़ा दिये है तो गल्ला व्यापारियों ने किसानों की उपज सहीं दाम में खरीदने से हाथ खडे कर दियें है, उन्हें पता है कि मजबुरी का मारा किसान ओने पोने दाम पर अपनी पसीने की कमाई भुगंडे के भाव में बेच देगा। इसी के चलते वें 1200 सो 1500 रूपयें  प्रति क्विंटल में गेंहू खरीद रहे है।

आने कल की तस्वीर डराती है........

कोरोना संकट की अफरा तफरी के बिच लोगो को आने वाले कल की चिंता सताने लगी है, रोज कमाकर खाने वाले हजारों परिवार इस समय बेहद मानसीक तनाव में अपना समय काट रहे है, उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि यह लाकडाउन कि यह पिडादायी अवधी वे कैसे काटे तथा आने वाले समय में अपने परिवार का भरण पोषण कैसे करें, क्योंकि देशबंदी की मार सबसे ज्यादा गरीबों पर हीं पडी है, सरकार भले हीं उन्हें तीन महिनें का प्रति परिवार को ओसतन सवामण अनाज, 5 किलो दाल तथा तीन महिनें की मुफ्त बिजली तो दे देंगी परन्तु दुध, शक्कर, साबन, सब्जी, तेल, मसाला, अनाज पीसाई, रोजमर्रा की दवाई, फोन रिचार्ज आदि के लिए पैसा कहां से आयेगा। एक तरह से उसका जीवन हीं ठप हो जाएगा। कई सामाजिक परिस्थितियों के जानकार यह बताते है कि इस स्थिती में गरीबी की रेखा के निचे जीवन यापन करने वाले कई गरीब परिवार बेरोजगारी की मार नहीं झेल पायेंगे तथा उनके परिवार के जिम्मेदार सदस्यों को भारी अवसाद घेर लेगा।

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