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Saturday, March 7, 2020

आचार्य श्रीउमेशमुनिजी "अणु" जन्मदिन पर विशेष ....


 थांदला से इमरान खान की रिपोर्ट


साधना की निरन्तरता से गुरूदेव में थी स्थिरता - जिनेन्द्रमुनि

 संयम में दृढ़ता रखते हुए चंचल मन को स्थिर करने के लिए निरन्तर अप्रमत्त भावों के साथ साधना की निरंतरता से जीव समाधि को प्राप्त करता है। जिनशासन गौरव आत्मार्थी पंडित रत्न जैनाचार्य पूज्य श्रीउमेशमुनिजी म.सा. "अणु" का 88वाँ जन्मदिन प्रसंग पर विशाल धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए बुद्धपुत्र प्रवर्तक देव पूज्य श्रीजिनेन्द्रमुनिजी म.सा. ने कहा कि आचार्य श्री का जीवन भी अप्रमत्त भावों के साथ निरन्तर साधना का रहा है। उनके लिये हर मौसम हर दिन एक समान थे वे कभी नही कहते आज दिन छोटा है या कम पड़ गया वे अपनी साधना को चित्त की एकाग्रता से साधते रहे। आगम की गाथा का विवेचन कर आपने कहा कि चंचल मन की स्थिरता लाने के लिये पुदगल विषय वस्तु पर एकाग्रमन सन्निवेश से चित्त का निरोध होता है। आचार्य श्री श्रुतभ्यास के द्वारा मन को स्थिर करते थे। उनके पास कोई भी आता वे उनसे धर्मचर्चा करते मांगलिक देते किंतु फिर भी उनकी लेखन क्रिया व उनकी चिंतनधारा का प्रवाह नही थमता था। उन्होंने एक बार पुनः बताया कि जिस प्रकार पत्थर को स्थिर करने के लिए उसे किसी स्थान पर टिकाना पड़ता है, पानी को पात्र से, अग्नि को हवा रहित स्थान से तो वायु को कठिनता से स्थिर किया जा सकता है उसी तरह चंचल मन को विशेष प्रयास व श्रुतभ्यास द्वारा एकाग्र किया जा सकता है।

वैराग्य की कला नही सीखी तो सब व्यर्थ - सन्दीपमुनि

धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए मधुर व्याख्यानी पूज्य श्रीसन्दीपमुनिजी ने कहा कि तीव्र संवेग निर्वेग भावों से लिये हुए संयम में भी यदि  सम्यक आराधना न हो तो तीन प्रकार की स्थिति बनती है। पहली साधु लिए हुए संयम का वमन कर संसार में लौट जाता है, दूसरी साधु जीवन में दुखी बनता है व तीसरी साधु रहकर भी संसारी प्रपंच में पड़ जाता है। उन्होंने कहा संयम लिया व वैराग्य भाव नही आये तो भव भ्रमण चालू है। ज्ञान बहुत सीखा दुनिया की कला भी बहुत सीखी लेकिन वैराग्य की कला नही सिख  पाए तो सब व्यर्थ है। उन्होंने आचार्यश्री के जीवन के रहस्य बताते हुए कहा कि धैर्य को धारण करने से वे आत्मार्थी बने व नियमित माला, स्वाध्याय, ध्यान में प्रवत्त बन कर उन्होंने आत्मसाधना की। वर्तमान विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करते हुए पूज्य श्री ने कहा कि गुरुदेव ने कभी उनके साहित्य का प्रचार नही किया, ध्यान मांगलिक में कभी संख्या बढ़ाने या उसे प्रचारित करने का कार्य भी नही किया व किसी भी प्रकार के संसारी प्रपंच में भी नही पड़ते हुए कषाय विजयी बने।

सकल संघ ने गुरुदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की

गुरुदेव के 88 वें जन्मदिन पर धर्ममय वातावरण में विराजित महासती निखिलशिलाजी म.सा. ने जय - जय बोलो नानी रा लाल री स्तवन से गुरुदेव को याद किया। श्रीसंघ अध्यक्ष जितेंद्र घोड़ावत ने कहा कि गुरुदेव के जीवन से प्रेरणा लेकर उनकी शिक्षा को धारण करने से उनकी कृपा स्वतः प्राप्त हो जाती है। उन्होंने सकल संघ की ओर से गुरुदेव को भावाजंलि देते हुए प्रवर्तक देव की महती कृपा व थांदला संघ को धर्म सन्देश देने के लिये 30 किमी का अतिरिक्त विहार परिषह सहन करने के लिये उनका उपकार माना। अणु बालिका मण्डल की खुशबू पालरेचा व अतिका शाहजी ने स्तवन प्रस्तुत किया। संचालन संघ सचिव प्रदीप गादिया ने किया। धर्म प्रभावना का लाभ घोड़ावत परिवार ने लिया।

धर्म सन्देश के साथ प्रवर्तक देव का कल्याणपुरा कि ओर विहार

प्रवर्तक देव पूज्य श्रीजिनेन्द्रमुनिजी, पूज्य श्रीसन्दीपमुनिजी, पूज्य श्रीआदित्यमुनिजी ने सकल संघ को धर्म सन्देश देते हुए कहा कि मन की एकाग्रता लाने के लिये व संयम में स्थिरता लाने के लिये 12 भावना का चिंतन, बाहरी घटनाओं का वैराग्य भाव से चिंतन कर श्रुत की आराधना करते हुए सामयिक, प्रतिक्रमण थोकड़े व आगम का अभ्यास करें व उसे बढ़ाने का अभ्यास करें। उक्त प्रेरणा देते हुए प्रवर्तक देव आदि ठाणा - 3 का कल्याणपुरा कि ओर विहार हो गया जहाँ कल उनका मंगल प्रवेश होगा व आगामी 9 मार्च को पक्खी पर्व की आराधना व 12 मार्च को अनेक स्थानों के श्रीसंघ की मौजूदगी में आगामी वर्षावास 2020 की घोषणा की जाएगी।

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