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Friday, April 24, 2020

सरकारी अस्पताल कर रहे युद्ध, निजी अस्पताल छोड रहे मेदान... मुख्यमंत्री ने निजी अस्पतालों को दी चैतावनी... भविष्य में सरकार बनायें प्रभावषाली योजना... इस महामारी से लेना होगा सबक.....


पेटलावद से हरिश राठौड़ की रिपोर्ट

पेटलावद। पदे्रश के मुखिया शिवराजसिंह चैहान द्वारा प्रदेश में चिकित्सकों पर हमले करने वालों के खिलाफ गेरजमानती धाराओं में कार्रवाई करने के साथ हीं निजी अस्पतालों को अपनी सेवाए नहीं देने पर लायसंेस निरस्त करने के निर्देश जारी कियें है। वहीं ग्रहमंत्री अमित शाह ने भी चिकित्सकों के साथ बैठक कर हमलावरों पर सख्त कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। वहीं देश के राष्ट्रपति ने चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मियों के उपर हो रहे हमले और उत्पीड़न के संबंध में सरकार की और से पेश अध्यादेश को 22 अप्रेल को अपने हस्ताक्षर करते हुए मंजुरी देते हुए कानून बनाने का रास्ता साफ कर दिया है। ।

मरीजों की बड़ी तादात जाती है गुजरात.....

पेटलावद सहित झाबुआ, अलिराजपुर, धार सहित सम्पूर्ण आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के अलावा रतलाम, उज्जैन तक के अधिकांश गरीब मध्यम परिवार सहित इस क्षेत्र के अधिकांश लोग चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए इंदौर के अलावा गुजरात के दाहोद, बडोदा, सुरत, अहमदाबाद तक स्वास्थ्य कारणों व इलाज के लिए जाते है। प्रतिदिन भोपाल से चलकर दाहोद तक चलने वाली मेमु ट्रेन में अधिकांश यात्रियों की यात्रा का कारण गुजरात क्षेत्र में उपचार के लिए जाना होता है, इसका सीधा अर्थ यह होता है कि हमारें पुरे क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाए इतनी कारगर व संसाधनों से युक्त नहीं है।

निजी अस्पताल काट रहे चांदी.......

हमारें क्षेत्र का गरीब से गरीब व्यक्ति भी स्वास्थ्य कारणों के चलते गुजरात के इन बडे बडे अस्पतालों पर पूर्ण रूप से निर्भर है और इन निजी अस्पतालों मेें गरीब व मध्यम वर्ग का इलाज के नाम पर जितना शोषण किया जाता है, जिसकी व्यथा हर इस क्षेत्र से जाने वाला नागरिक जानता है। गुजरात में स्वास्थ्य सेवाओं को उघोग के रूप में स्थापित किया जा रहा है, इसलिए तो आज से 15 वर्ष पूर्व जहां दाहोद मे ंकुछ गीने चुने निजी अस्पताल थे वहीं आज दाहोद, सुरत, बडोदा में बडे बडे सुपरलिटी हास्पिटलों की बाढ सी आ गई है जिसका सीधा से अर्थ यह है कि सेवाओं के इस क्षेत्र में प्रायवेट अस्पतालों के द्वारा इलाज के नाम पर खुब चांदी काटी जा रहीं है। वहीं म.प्र. के मालवा क्षेत्र के अधिकांश लोगो से गुजरात क्षेत्र आज स्वास्थ्य सेवाओं की जगह स्वास्थ्य उद्योग के रूप में फल फुल रहा है।।

विदेश तक जाते स्वास्थ्य के लिए....

आदिवासी क्षेत्र सहित प्रदेश का पंुजिपति व अमीर आदमी छोटे से छोटी बीमारी या सर्जरी के लिए देश के संसाधनों से दुर विदेशों में जाकर अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखता है, यहां तक की विदेश मे ंस्वास्थ्य लाभ लेने के लिए जाने वाले बडे-बडे पंुजिपति देश के सरकारी अस्पतालों की स्वास्थ्य सेवाओं पर कभी विश्वास नहीं करते थे आज वें सभी बडे-बडे विदेशी भक्त भी सरकारी अस्पतालों के द्वारा की जा रहीं व्यवस्थाओं और कामों की मुक्त कंठ से पं्रसंशा करते नहीं थक रहे है और सरकारी चिकित्सकों तथा कोरोना योद्धाओं को हर जगह सम्मान दिया जा रहा है।

गरीब आदमी है मजबुर......

एक समय भुखा रहकर अपना पेट काटकर मजदुरी से कमायें हुए पैसो को भी वक्त आने पर गरीब आदमी इलाज के नाम पर बिना किसी संकोच के डाॅक्टरों के सामने अपने मुट्ठी खोल देता है, हालांकि इन बडे प्रायवेट हास्पिटलों में बेहतरिन संसाधनों के साथ अच्छा इलाज किया जाता है इसलिए पैसा लगने के बाद मरीज के ठीक होने पर गरीब आदमी इस शोषण को अनदेखा भी कर देता है जिसके पिछे म.प्र. व मालवा क्षेत्र में सरकारी अस्पतालों में संसाधनों और सुविधाओं की कमी व सरकारी चिकित्सकों के निजी प्रेक्टीस के कारण गरीब आदमी को या तो झोलाछाप डिग्री विहिन बंगाली डाॅक्टरों पर निर्भर होना पड़ता है या गुजरात व इंदौर के बडे निजी अस्पतालों की शरण में जाना पड़ता है।

निजी अस्पताल बंद.....

जब से देश में कोरोना का कहर बड़ा है, तब से अधिकांश निजी अस्पतालों द्वारा लाॅक डाउन का बहाना बनाकर ताला लगाकर स्वास्थ्य सेवाएं पूर्ण रूप से बंद कर चुके है। लेकिन प्रतिदिन 100 से 200 मरीजों को देखने वाले बडे बडे चिकित्सक और सुपर स्पेशलिस्टी सेंटर व नामी गिरामी प्रदेश सहित अन्य राज्यों के अस्पतालों व स्टाप के द्वारा जो गरीब आदमी के इलाज के नाम पर लाखों रूपयें की चांदी काटी जाती थी, संक्रमण के इस दौर में इन सभी निजी अस्पतालों के द्वारा अपनी कोई जिम्मेदारी या योगदान देश और समाज के लिए नहीं देना यह बात पुरा देश देख रहा है और इसी के चलते सरकारों को निजी अस्पतालों के लिए ठोस कदम उठाने पड़ रहें है।

सरकार की निर्भरता......

प्रतिवर्ष केन्द्र व राज्य सरकारों के द्वारा पेश कियें जाने वाले बजट का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा स्वास्थ्य व रोजगार के लिए रिजर्व रखा जाता है वहीं सरकार के द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में आमुलचुल परिवर्तन लाने के लिए कई वर्षो तक लगातार प्रयास कियें है साथ हीं शिक्षा का अधिकार कानून जैसे नियम बनाकर अनिवार्य शिक्षा का पेटर्न लागु किया है जिसके चलते देश में शिक्षा का स्तर सुधरता नजर आ रहा है, वहीं रोजगार के लिए भी कई अवसर व योजनाए निजी क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध करवाने के नाम पर बनाई जा रहीं है।

बनानी होगी नई योजनाएं.....।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार को अब भी बहुत कुछ करना बाकि है, जानकार सुत्रों की माने तो सरकार द्वारा पुरे बजट में दो से पांच प्रतिशत भाग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए रखा जाता है। वेश्विक महामारी कोरोना के संक्रमण काल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्देश पर वित्त मंत्रालय के द्वारा 15 हजार करोड़ रूपयें का विशेष फण्ड भी इस बिमारी से लडने के लिए जारी किया गया है वहीं स्वास्थ्य सेवाओं से जुडे हुए लोगो का बीमा करने का भी आदेश सरकारों के द्वारा दिया गया है।

सरकारी अस्पतालों को करें और मजबुत....

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा इसके पहले आयुष्मान भारत योजना लागु की गई थी जिसमें गरीब परिवारों के सदस्यों को निशुल्क उपचार की व्यवस्था की गई है। इतना सब कुछ करने के बावजुद वेश्विक महामारी के इस दौर में आज देश सरकारी अस्पताल एवं उनसे जुडे हुए स्वास्थ्य अमले पर हीं पूर्ण रूपे से निर्भर है। बीमारी के इस दोर में सरकार को और योजना बनाने वाले बुद्धिजिवियों व निती आयोग को इस बात से जरूर सबक लेना चाहिए की वें आने वाले समय में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जो भी योजनाए बनायें उसमें विशेष रूप से ऐसी योजनाए बनाई जाए जिससे देश व प्रदेश की जनता निजी अस्पतालों की अपेक्षा सरकारी अस्पतालों पर ज्यादा भरोसा करें और सरकारी अस्पतालों में सुविधा, संसाधन, चिकित्सक व जांच करने के लिए लेबोरेटरी की कमी न हो और सरकारी अस्पताल अपने आपमें और मजबुत है। ताकि संकट के समय सरकारी अस्पताल अपनी जिम्मेदारियों पर और अधिक खरा उतर सकें और भविष्य में सरकारों को विषम परिस्थितियों में लडने के लिए और मजबुती मिल सकें।


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