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Thursday, May 28, 2020

कचरे के ढेर में जीवन तलाशने को मजबूर नन्हे नोनिहाल..... सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं बेअसर...


समाचार20 सेओपीमालवीय की रिपोर्ट


नन्हे नोनिहाल इन्हें देश का भविष्य कहा जाता है.....जिनके कांधो पर पुस्तकों से भरा बैग ओर हाथ मे पेन होना चाहिए...
लेकिन वही नन्हे नोनिहाल अपने कांधो पर थैले लादे है.…..
कचरे के ढेर में भंगार ढूंढकर कुछ रुपयों की जुगत कर रहे है। जिन मासूमो के नन्हे हाथों में खिलौने, पुस्तकें होना चाहिये वह अपनी तकदीर, लाचारी के कारण गन्दे कचरों के ढेरों में हाथ मार रहे है। सरकारें ऐसे मामलो को रोकने के लिए जनकल्याणकारी योजनाएं बनाती ही लेकिन धरातल पर सभी योजनाएं खोखली साबित होती नजर आ रही है। जिम्मेदार जनप्रतिनिधि, अधिकारी भी नोनिहालो के भविष्य को लेकर चिंतित नजर नही आ रहे है...अगर ईमानदारी से सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं जमीनी स्तर पर लागू होती तो आज के समय मे हालात कुछ और होते। लाख प्रयास करने के बाद भी सरकार की योजनाएं बेअसर हो रही है। लापरवाही का शिकार यह बच्चें अपना व देश का भविष्य क्या ऐसे बना पाएंगे..?
 इन नोनिहालो को तो यह भी पता नही है कि आज जो वह कर रहे है, यह कदम इनके भविष्य को अंधकार की ओर धकेल रहा है। बच्चे भी क्या करें...मजबूरी, गरीबी, भूख ओर लाचारी के चलते न चाहते हुए भी उन्हें ऐसे कार्य करने को मजबूर होना पड़ता है। तस्वीर पेटलावद स्थित मेला ग्राउंड की है जहाँ छोटे-छोटे बच्चे कचरे के ढेर में कुछ भंगार एकत्रित कर रहे है। उनसे पूछा गया कि आप यह काम क्यो कर रहे हो
इसका उनके पास कोई जवाब नही था, थोड़ी देर बाद वह सर झुकाकर वहां से निकल गए। आज भी ऐसी तस्वीरे मन को ठेस पहुचाती है...।

कहा है जनकल्याणकारी योजना....

सरकारों द्वारा इन नोनिहालो के बेहतर भविष्य के लिए अनेको जनकल्याणकारी योजनाओं का बखान किया जाता है, लेकिन धरातल पर योजनाओं का कोई असर नजर नही आता है। जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों ओर अधिकारियों द्वारा अगर पूरी ईमानदारी से योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाता तो शायद इन नोनिहालो को अपने पेट के खातिर कूड़े, कचरे में फेंके गए रद्दी सामानों को ढूंढकर अपनी भूख मिटाने को विवश नही होना पड़ता। रोजाना शहरी क्षेत्र में ऐसे कई बच्चे देखे जा सकते है जो कचरो के ढेर में अपनी ज़िंदगी तलाश रहे है। ग्रामीण क्षेत्रों की बात तो अलग ही लेकिन शहरी क्षेत्रों में आये दिन नन्हे नोनिहाल कचरे के ढेरों में खोकर अपना पालन पोषण करने में लगे। जिन बच्चो के हाथों में देश का भविष्य देखा जा रहा है, उनकी सुध लेने वाला कोई नही है। सरकारें घोषणाएं करके इतिश्री कर लेती है, ओर सारा जिम्मा अपने सर पर लिये यह बच्चे आज भी बेबस, लाचारी, गरीबी का दंश झेल रहे हैं। बाल सरंक्षण के लिए बनाई गई सभी योजनाओं को मुह चिढ़ाती ऐसी तस्वीरें हर रोज देखना आम हो गया है। इस ओर जिम्मेदारी का जिम्मा लिए अधिकारियों का भी कोई ध्यान नही है। आवश्यकता है सरकार की योजनाओं को सही से क्रियान्वित करने की जिससे की ऐसे बच्चो का भविष्य अंधकारमय होना से बचाया जा सके। इसके लिए जनप्रतिनिधियों,अधिकारियों, सामाजिक संस्थानों को आगे आना होगा।

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