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Tuesday, June 9, 2020

तार, बांस का खर्च अब नहीं..... खेती में नुकसानी की विपरित परिस्थियों में किसानों ने परपंरागत खेती का रास्ता अपनाया....



पेटलावद से हरिश राठौड़ की रिपोर्ट

पेटलावद। कोराना वायरस की महामारी के कारण लागु कियें गयें लाॅक डाउन में सबसे अधिक आर्थिक मार किसानों पर पड़ी है। किसानों की फसलों की सहीं किमत नहीं मिल रहीं है तथा खाद, बीज, बिजली, किटनाशक आदि के महंगे हो जाने के कारण खेती में लागत भी बढ़ गई है। एैसे में किसानों के लिए अब खेती करना दिनों दिन कठिन होता जा रहा है। किसान अपनी आर्थिक नुकसानी की भरपाई के लिए अब पुरानी खेती पद्धती को अपना रहे है। आगामी खरीब सीजन में क्षेत्र के कई किसान मिश्रित खेती अपना रहे है। पुराने जमाने के अनुसार वह कई तरह की फसले अपने खेत में बोने की योजना बना रहे है तथा कईयों ने ऐसी फसले अपने खेतो मे ंलगा भी दी है।

एक फसली खेती के नुकसान.....

आधुनिक खेती के नाम पर पिछले कई सालों से मिर्च, कपास, टमाटर जैसी एक फसली खेती लोग कर रहे है तथा बडे क्षेत्रफल में एक हीं फसल लगाते है, इससे फसल पर रोग अथवा किढो का प्रकोप होने पर किसान को अत्यधिक नुकसान उठाना पड़ता है। जैसे सोयाबीन में कई बार फली न लगने की समस्या आती है तो कई बार तना काटने वाली इल्ली का हमला हो जाता है, एैसे में फसल चोपट हो जाती है। इसी तरह कपास पर फल छेदक सुंडी का हमला होता है और चिपचिपा रोग भी हो जाता है, इससे भी किसानों को हजारों रूपयें का नुकसान उठाना पड़ता है। इस तरह मिर्च और टमाटर में भी विल्ट तथा अन्य संक्रामक रोग होता है, इससे भी किसानों को नुकसान होता है। इन सब कारणों से किसान की आर्थिक स्थिती कमजोर हो जाती है जिससे उन्हें लाखों का कर्जा हो जाता है।

लाॅक डाउन में भी हुआ नुकसान....

कोरोना वायरस के फैलने की आंशका के साथ हीं केन्द्र सरकार ने जब लाॅक डाउन की घोषणा की तो सबसे ज्यादा इसकी मार किसानों पर पड़ी। किसानों की फसले जैसे तरबुत, खरबुज, पपीता तथा अन्य सब्जी फसलों को बाजार में नहीं ले जा पायें, इससे फसले खेतो में हीं सड़ गई। इससे किसान को बढ़ा नुकसान हुआ यहीं नहीं फसलों की रोगो व किढ़ों से रक्षा करने के लिए भी लाॅक डाउन के दौरान किसानों को कोई उपाय नहीं सुझ पड़ा। इस स्थिती में किसान पर खेती को आगे बढ़ाने तथा बेंको का कर्ज उतारने की चिंता हावी हो गई। किसान लाॅक डाउन में हुई नुकसानी को पुरा करने के लिए कई तरह के जुगत लगाने की सोचने लगे है।

परपंरागत खेती बनी सहारा....

खेती में नुकसानी की विपरित परिस्थियों में किसानों ने परपंरागत खेती पर रास्ता अपनाया है, परपंरागत खेती में मोनोक्राप कल्चर के लिए कोई जगह नहीं है यानि खेत में एक हीं प्रकार की फसल लगाकर किसान कोई जोखिम नहीं उठाता है बल्की अपने खेत में फसल चक्र अपनाते हुए कई तरह की फसले लगाता है, उक्त फसले आपस में एक दुसरे की पुरक होती है तथा भूमि से पोषक तत्व लेने के मामले में एक दुसरे की होड़ नहीं करती है, इससे सभी तरह की फसलों की बढ़वार अच्छी हो जाती है।

फसल चक्र का फायदा....

फसल चक्र अपनाने से भूमि की उर्वरक क्षमता पहले की तरह बनी रहती है फसलों की उपज में विपरित असर नहीं पड़ता है। फसल चक्र अपनाने से यदि एक फसल पर किसी रोग अथवा किढे का हमला होता है और वह खराब हो जाती है तो दुसरी फसल अपनी पेदावार के माध्यम से नुकसानी की भरपाई कर देती है, इस तरह किसान की आर्थिक स्थिती डगमगाती नहीं है।

आधुनिक खेती ने किया बंटाढार.....

इतने सालों से आधुनिक खेती के नाम पर खेतो में अंधा धुन किटनाशकों एवं रसायनिक उर्वरकों का  उपयोग करने के कारण खेती की लागत बहुत बढ़ गई तथा मंहगे हाईब्रिड बीजों के कारण भी किसानों को भारी खर्च करना पड़ा जबकि उन्हें वह फसल मिलती उससे उन्हें उतना मुनाफा नहीं मिल पाता की वह कर्ज अदा करने के बाद अपने परिवार को अच्छी तरह पाल सकंे। इस स्थिती में किसानों ने मिश्रित खेती अपनाना शुरू कर दिया है। ग्राम गोठानिया के युवा किसान अजय पंवार ने बताया कि उन्होने अपने खेत में गराडुं, तुअर, मक्का आदि फसले लगाई है जिसके लिए उन्होने तार, बांस का खर्च भी नहीं किया और उन्होने एैसी तरकिब लगाई की गराड़ू की बेले मक्का और तुअर की फसल पर चढ़ जाए तथा जमिन में अच्छा कंद बना रहे। उक्त तीनों फसलों में किटनाशक और रसायनिक उर्वरक का उपयोग भी नहीं किया गया है। उन्हंे उम्मीद है कि इस खेती मे ंउन्हें अच्छा लाभ होगा तथा लागत भी कम लगेगी। किसान अजय ने पहली बार अपने खेत में अप्रेल माह में 5 बीद्या खेत में 8 क्विटल गराड़ू का बीज लगाया है जिसे अक्टूम्बर माह में पकने की उम्मीद है।


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