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Sunday, June 14, 2020

कृषि में आत्मनिर्भरता के लिए बांटे देशी बीज.... सेंकडो किसान बन रहे है स्वावलंबी....

कृषि में आत्मनिर्भरता के लिए बांटे देशी बीज....  सेंकडो किसान बन रहे है स्वावलंबी....
                            फ़ोटो- बीज वितरित करते हुए
   
पेटलावद से हरिश राठौड़ की रिपोर्ट

पेटलावद। कोरोना महामारी के प्रसार की आशंका के चलते लगाए गए देशव्यापी लाकडाउन से सर्वाधिक परेशानी किसानों को हुई है । झाबुआ जिले के पेटलावद तथा अलीराजपुर जिले के अनेक गांव में किसानों को इस आपदा के समय में प्रामाणिक देसी बीज उपलब्ध करवाने का कार्य स्वयं सेवी संस्था संपर्क द्वारा किया गया। इन दिनों कृषि क्षेत्र में किसानों को कई समस्याओं से जूझना पड़ रहा है । कृषि क्षेत्र में कंपनी वाद के बढ़ते प्रभाव तथा आधुनिक कृषि के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दखल के चलते खेती की लागत अत्यधिक बढ़ जाने से किसान आर्थिक रूप से बेहद विपरीत हालात भुगत रहे हैं।  रासायनिक उर्वरक, महंगे बीज और कीटनाशकों की खरीदी में किसानों की अर्थव्यवस्था डामाडोल हो रही है, खेती, निरन्तर 1 ही तरह की फसल लेने के कारण किसानों को घटा देने लगी है। जिनान्तरित बीज बोने से पर्यावरणीय असंतुलन पैदा होता है एवं भूमि की उर्वरा शक्ति भी तेजी से घटती है, इन सब बातों के मद्देनजर संस्था ने खेती में विविधता लाने के लिए तथा देशी बीजों को बढ़ावा देकर किसान को आत्मनिर्भर कृषि की ओर अग्रसर करने के उद्देश्य से उन्हें विभिन्न फसलों के पारंपरिक बीज चाइल्ड फंड इंडिया के सौजन्य से वितरित किए।

दलहन व तिलहन के बीज बांटे....

इस श्रंखला में किसानों को मूंगफली, तिल मूंग, उड़द, चवली, साठि मक्का, रामतिल्ली, अरहर आदि फसलों के देसी बीज वितरित किए ताकि किसान अपनी कृषि को बहुआयामी बना सके तथा अपने खेतों में जैव विविधता की बहाली कर सकें इस दौरान वितरण के साथ किसानों को जैविक तरीके से पौध संरक्षण करने एवं आधुनिक कृषि के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उत्पादित महंगे कृषि आदान ना लेकर अपने घर पर बनाए हुए जैविक खाद तथा कीट नियंत्रक घोल का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया गया।  किसानों को समझाया गया कि यदि वे स्वावलंबी खेती करना चाहते हैं तथा कृषि के रास्ते समृद्धि लाना चाहते हैं तो उन्हें पारंपरिक बीजों को बचाना होगा तथा कृषि की पुरातन पद्धति जिसमें गोबर की खाद , गोमूत्र, पंचगव्य, वनस्पति पत्तियों के स्वरस से निर्मित किट नियंत्रक का प्रयोग किया जाता है उसे अपनाना होगा।  किसानों को खरीफ फसल में विविधता पूर्ण खेती करने के अलावा खरपतवार निकालकर उसी के द्वारा मल्चिंग करते हुए वर्षा की लंबी खेच के दिनों में भूमि की नमी को सुरक्षित रखने के तरीके के बारे में बताया गया । उन्हें सलाह दी गई कि वह अधिक से अधिक डोरा तथा कुल्पा चलाएं ताकि भूमि में वायु संचरण ठीक हो सके।  इसके अतिरिक्त किसानों को बताया गया की खेतों में केंचुआ खाद ठंडा पानी तथा तांबे के बर्तन में रखी छाछ का उपयोग कर फसलों को प्राकृतिक पोषक तत्व उपलब्ध करवाएं। इस ढंग से खेती की लागत भी कम होगी और उनका स्वास्थ्य भी सुधरेगा संकल्प किया की वे न केवल देशी बचाएंगे बल्कि इसे अधिक किसानों तक पहुचायेंगे।

नगदी फसलों का प्रचलन बढ़ा...

बीते सालों में क्षेत्र में दलहन और तिलहन का रकबा कम हो गया है तथा नगदी फसलों की ओर किसानों का रुझान अधिक हुआ है जबकि हकीकत यह है कि नकदी फसलों के चक्कर में किसान पूरी तरह बाजार पर निर्भर हो गया है और उसे भारी घाटा उठाना पड़ता है हाल ही में लॉक डाउन के दौरान तरबूज ,खरबूज तथा टमाटर उत्पादकों को भारी घाटा उठाना पड़ा इन फसलों के उत्पादन में अत्यधिक खर्च होता है तथा किसान लगातार कर्ज के दलदल में डूबता जाता है । किसान को इसी बर्बादी से बचाने के लिए संस्था द्वारा बीते वर्षों में एक अनूठे व्हिच बैंक की स्थापना की गई है। बैंक में बड़ी मात्रा में विभिन्न फसलों की देसी किस्में संग्रहित की गई है ,जैसे उड़द की पांच किस्में ,मक्का की पांच किस्में, अरहर की 6 किस्में , तिल की चार किस्मे, इसी तरह टमाटर, बैंगन विभिन्न प्रजातिया संग्रहित की गई है जिन्हें किसानों को वितरित किया जाता है । उक्त बीज बैंक से जुड़कर क्षेत्र के लघु और सीमांत किसान स्वावलंबी और कम लागत की खेती कर कर्ज मुक्त होने की तरफ कदम बढ़ाते हैं। उक्त बीज बैंक से पिछले 5 वर्षों में क्षेत्र के 500 से अधिक किसान जुड़ चुके हैं। खरीफ फसल कटाई के बाद यह किसान साफ सुथरा गुणवत्तापूर्ण बीच ब्याज सहित बैंक को लौट आते हैं जो अगले सत्र में अन्य किसानों को दिया जाता है।  इसी तरह रबी सत्र में भी किसानों को गेहूं, चना ,अरंडी ,सरसों , मसूर आदि फसलों के बीज वितरित किए जाएंगे।

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